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शुक्रवार, 17 मई 2019

मक्का की जैविक खेती Makka ki kheti jankari hindi me

किस्में
मक्का की संकर गंगा सफ़ेद 2, डक्कन 103, संकुल क़िस्में विजय, नवजोत, माही धवल, माही कंचन, का 20-25 किलो प्रति हेक्टेअर प्रमाणित बीज बोयें। जल्दी पकने वाली क़िस्मों में बीज की मात्र 30 से 35 किलो काम में ले। 


     अगर बीजों पर कम्पनियों का कब्ज़ा रहा तो किसान स्वतंत्र हो ही नहीं सकता. इस लिये अपना बीज बनाना क़ुदरती कृषि का आधार है. अपने बाप-दादा के ज़माने के अच्छे बीजों को ढूंढ़ कर इकट्ठा करें और उन्हें बढाएँ और बाँटें. देसी बीज से मतलब ऐसे बीजों से है जिन्हें हम कई सालों तक प्रयोग कर सकते हैं और उन्हें हर एक-दो साल में बदलने की ज़रूरत नहीं रहती. बीज बनाते समय इस बात का ख़याल रखें कि एक किस्म के बीज के पास दूसरी किस्म की बिजाई न हो. यह् दूरी अलग-अलग फ़सलों के लिये अलग-अलग होती है. जैसे गेंहू और धान में 5 फ़ुट की दूरी काफ़ी रहती है तो मूंग और सरसों में यह दूरी 200 मीटर होनी चाहिए.
     अगर आप स्वयं इन बीजो को नहीं बढ़ा सकते तो अच्छे  देसी बीज इकट्ठे ज़रूर कर लें और हमें सूचित करें. देश में कई लोग पुराने देसी और अच्छी किस्मों के बीज बढ़ाने का काम कर रहे हैं. इन में से एक हैं बनारस के रघुवंशी जी. इन्होंने कई बहुत उपजाऊ बीज इकट्ठे किये है और बड़े पैमाने पर इन्हें मुफ़्त में किसानों में बांटा है. इस के लिय इन्हें दो बार राष्ट्रपति सम्मानित भी कर चुके हैं. हम ऐसे लोगों तक आप द्वारा एकत्रित बीज पहुँचा देंगे और उन के माध्यम से ये बीज देश भर में फैल जायेंगे.
बीज की अंकुरण जाँच और उपचार

अच्छी देसी तथा उन्नत किस्म का चुनाव करने के बाद भी बोने से पहले दो काम ज़रूर करने चाहियें. एक तो बोने से पहले ही अंकुरण कर के पड़ताल कर के देख लें कि बीज अच्छा है या नहीं. अच्छा बीज होने पर भी बीज-उपचार कर के ही बुआई करें.
     अंकुरण जाँच: यह वैसे ही करना है जैसे घरों में दाल आदि को अंकुरित किया जाता है. बीज को कुछ घंटे पानी में भिगो कर रख दें.(यह अवधि मौसम और बीज के स्वरूप अनुसार बदलती है. चने को गर्मी के मौसम में 7-8 घंटे भिगोने की ज़रूरत है. सर्दी के मौसम में ज़्यादा समय लगेगा. पतली परत वाले बीजों में कम समय लगेगा.) फिर उन दानों को मोटे सूती कपड़े में लपेट कर और गीला कर के अंधेरी परन्तु हवादार जगह में रख दें. नमी बनाये रखें. अंकुरण होने पर गिन कर देख लें कि अंकुरण का प्रतिशत कितना है. कम से कम 70-90% अंकुरण होना चाहिये वरना बीज बदल लें. अगर बीज बदलना सम्भव न हो तो उसअनुपात में बीज की मात्रा बढ़ा लें.
     अंकुरण जाँच का एक और आसान तरीका यह है कि अख़बार के पन्ने की चार तह बना लें और इसे पानी में भीगो दें. बग़ैर चुनेबीज की बोरी में से आँख मीच कर 50-100 दाने निकाल कर भिगो लें और खुले खुले अख़्बार पर डाल दें और अख़बार को लपेट लें. फिर दोनों कोनों को धागे से हल्के से बंद कर दें. ज़्यादा न दबाएँ. इस पुड़िया को फिर पानी में भिगो लें. फ़ालतू पानी निकल जाने पर इस पुड़िया को एक प्लास्टिक के लिफ़ाफ़े में डाल कर घर के अन्दर लटका दें. 3 -4 दिन बाद खोल कर अंकुरित दानों की संख्या गिन लें.
     ज़ाहिर है, अंकुरण जाँच का यह काम आप को बीज बोने से 2-3 सप्ताह पहले कर लेना चाहिए ताकि अगर बीज बदलना हो तो समय रहते बीज बदला जा सके. अगर बीज अच्छा न निकले तो इस सबूत के साथ दुकानदार को बीज लौटाना भी आसान होगा.
     बीज-उपचार: सब से पहले तो अगर बाज़ार से बीज लिया है तो उसे 5-10 बार साधारण पानी से धो लें (क्योंकि बाज़ार में मिलने वाला बीज ज़हरीले तत्वों से उपचारित होता है). अगर अपना घरेलू बीज प्रयोग कर रहे हैं तो देख कर कमज़ोर दिखने वाले बीज निकाल दें और अच्छे बीज छांट लें. फिर बीज उपचारित करें. बीज उपचार की कई विधियां हैं.  
पहली विधि में 10 किलो गाय का गोबर और 10 लीटर मूत्र और 20 किलो दीमक की बाँबी, कीड़ियों की बाँबी या ऐसे पेड़ के नीचे की ऊपरी 1 इंच मिट्टी या डोले की मिट्टी, जिसमें कीटनाशक न प्रयोग किये गयें हों, ले कर मिला लें और आटे की तरह गूंथ लें. इस में 60 से 100 किलो बीज मसल लें, बीज पर इस मिश्रण की परत चढ़ जायेगी. यह घोल मोटे बीजों के लिये थोड़ा घना हो और छोटे बीजों के लिये पतला हो ताकि सब बीज आसानी से अलग अलग हो जाएँ. उपचारित बीज को छाया में सुखा कर रख लें. 
दूसरी विधि में 5 किलो गोबर और 5 लीटर मूत्र, 50 ग्राम चूना (पान में प्रयोग होने वाला) 20 लीटर पानी में 24 घंटे के लिये भिगो कर रख दें. फिर इस घोल में बीज कुछ देर रख कर निकाल लें, और छाया में सुखा कर रख लें.
     उपचारित बीजविशेष तौर पर गोबर की परत चढ़े बीज के कई फ़ायदे हैं. इन को पक्षी नहीं खाते और लेप होने से कई दिन तक नमी बनी रहती है. इस लिये फ़ुटाव ज़्यादा होता है. दूसरी और अगर बिजाई के तुरन्त बाद सूखा पड़ जाए तो बीज में फ़ुटाव नहीं होता परन्तु बीज सुरक्षित रहता है और पानी मिलने पर उग जाता है. इस लिये उपचारित बीज बोने पर दोबारा बीज बोने की नौबत नहीं आती.
अमृतपानी नाम का एक ऐसा तरल तैयार किया जिससे बीजों को शोधित करने पर उनमें कीड़े लगने कीसम्भावना बहुत कम हो गई।     
 अमृतपानी बनाने की पूरी विधि- 

आवश्यक सामग्री

किलो देसी बेसन
किलो देसी गाय का मूत्र
किलो नीम की पत्ती
250 ग्राम देसी अकोड़ो
250 ग्राम धतूरे की पत्तियां
100 ग्राम लहसुन
100 ग्राम तम्बाकू का चूरन
250 ग्राम देसी गुड़
10 लीटर पानी

बनाने की विधि

इन सब पदार्थों का मिश्रण बनाकर अच्छे से घोल लेते हैं। फि र इस मिश्रण को मटके में डालकर मटके का मुंह बंद कर देते हैं ताकि मटके के भीतर जो गैसबने वो बाहर न आने पाये। 15 दिन के बाद मटके को खोला जाता है और इस मिश्रण को डन्डे से अच्छी मथ लेने के बाद छान लिया जाता है। छानने के बादइसे मिटटी के बर्तन से निकालकर किसी और बरतन में रख दिया जाता है।

20 दिन में बनकर तैयार हो जाने वाले अमृतपानी का प्रयोग बीजों को शोधित करने के लिये किया जाता है। इससे शोधित किये हुए बीजों से चमकदार औरअच्छी फ सल उगती है। साथ ही फ सलों में रोग और कीड़े लगने की सम्भावना भी कम हो जाती है।

बुआई

बुआई जून के अंत से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करें। सिंचित क्षेत्रों में 15-30 जून तक बुआई कर दे। अगेती फ़सल लेना ज्यादा उपयुक्त रहता है। क़तार से क़तार की दूरी 60 सेंटीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 25 सेंटीमीटर रखें। पौधों की संख्या प्रति वर्ग मीटर 6-7 होनी चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्ताह तक वर्षा न हो तो पहले से तैयार खेत में वर्षा होने की सूचना प्राप्त होने पर वर्षा आने से 2-3 दिन पूर्व सुखी बुआई करना लाभदायक पाया गया है।  

खरीफ फ़सल लेने हेतु खेत कि तैयारी के लिए जैविक खाद बनाने तथा जैविक खेती का तरीका


प्रति एकड़  खेत के लिए 100 किलो ग्राम देसी गाय का गोबर , 15 किलो देसी गाय का मुत्र ,2 किलो ग्राम गुड़  , 2 किलो ग्राम बेसन किसी भी दाल का , 2 किलो ग्राम बिना जोती  हुयी मिट्‍टी  लेकर अच्छी  तरह मिलाकर गुंथ कर छांव में सुखा लेते है , सुख जाने के बाद लकड़ी  से कूट  कर छान कर बोरे में भर लेते है या 4-5 दिन सुखने के बाद थोड़ा गिला रहने पर छलनी से छान लेते है और जमीन पर फैला देते है अच्छी तरह सूख जाने पर बोरे में भर लेते है ,फ़सल बुवाई से पहले खेत तैयार करते वक्त एक एकड़ में छिड़काव कर देते है ,और किसी भी खेत के अवशेष से जमीन को ढांक देते है अगर खेत में नमी नही है तो पानी लगा देते है ,उसके बाद  बिज उपचारित कर छिड़काव या सिडील   या हल  पद्ध्ती से बुवाई कर देते है फ़सल उग आने के बाद 200 लीटर  के ड्रम  में 15 किलो देसी गाय का ताजा गोबर, 15   लीटर देसी गाय का मुत्र ,2 किलो ग्राम गुड़ ,, 2 किलो ग्राम बेसन किसी भी दाल का , 2 किलो ग्राम बीना जोती  हुयीं जमीन या पड़तीं जमीन या बरगद के निचे कि मिट्‍टी और बाकी सादा पानी मिलाकर छांव    में रखकर प्रतिदिन सुबह दोपहर शाम लकड़ी से चलाकर अच्छी तरह घोल बनाकर दो दिन बाद तीसरे दिन एक एकड़ में छिड़काव कर दे , अगर किसी वजह से दो दिन में छिड़काव नहीं हो पाता तो सात दिन के अंदर किसी भी दिन  छिड़काव कर सकते है सात दिन के बाद घोल में पावर या ताकत कम हो जाता है अतः सात दिन के अन्दर छिड़काव कर देना चाहिये छिड़काव करने के लिए बाल्टी में घोल लेकर मग  से बराबर बराबर मात्रा में एक समान एक एकड़ खेत में छिड़काव करना चाहिये अगर इस तरह के छिड़काव में कोइ असुबिधा हो तो घोल में और पानी मिलाकर छान कर पंप द्वारा भी छिड़काव कर सकते है कम से कम महीने में  दो बार छिड़काव करना चाहिये , खेत में नमी होना अनिवार्य है अगर नमी नहीं है तो सिंचाई करे या पानी खेत में  लगाए इस तरह दो महीने कि फ़सल है तो चार बार , तीन महीने कि फ़सल तो छ बार , चार महीने कि फ़सल है तो आठ बार घोल का छिड़काव करना चाहिये , रासायनिक खाद और कीटनाशक आपको छोड़ना होगा ,2-3 बार घोल का छिड़काव करने पर आपको बिश्वाश  रिज़ल्ट देखकर होने लगेगा धिरे धीरे जमीन में सभी लाभदायक जीवाणु ,केचुवे वगैरह सब आ जायेंगे , धीरे धीरे मेढ़क भी आ जायेंगे वैसे खेत में कोई रोग आएगा नहीं क्योकि फ़सल में रोगों से लड़ने कि झमता बाढ़  जाती है इल्ली मच्छर किट पतंगों को मेढ़क खा जाता है बाइ चांस किसी भी तरह  का कोई बीमारी आ ही जाय तो गौ मुत्र में नीम का पत्ता पानी में उबाल करउस पानी को   या देसी गाय का 15 - 20 दिन पुराना छाछ गौ मुत्र में मिलाकर फ़सल पर पंप द्वारा छिड़काव करे , जैविक बिधि से खेती करने पर ओगरा का कोई असर खेत में होगा ही नहीं  , इस तरह से आप जैविक खेती से  बिष मुक्त फ़सल बीना कोई लागत के तैयार कर सकते है भरपूर फ़सल उत्पादित कर सकते है आपको रासायनिक  खाद कीटनाशक को  छोड़ना ही होगा धीर धीरे आपके खेत में नमी बराबर रहेगी पानी कम लगेगा और उत्पादन भी भरपूर होगा , बाज़ार पर आप भरोशा मत करिये अपना देसी बीज ख़ुद तैयार करिये हाइब्रिद     बीज से दूर रहिये , जब आप को पूर्ण  भरोसा  हो जाय कि हम जैविक खेती सफलता पूर्वक कर सकते है तो आप जैविक प्रमाण पत्र के लिए 25 रुपये हेक्टेयर जमा कर आबेदन कर  जैविक  किसान बन  जैविक  बिष मुक्त फ़सल उत्पादन करे |

अन्तर्शस्य
मक्का की एक क़तार के बाद सोयाबीन की एक क़तार की बुआई 30 सेंटीमीटर की दूरी पर करें। मक्का की दो कतारों के बाद उड़द की दो क़तार भी बोई जा सकती है। .

निराई-गुड़ाई  व सिंचाई
  पौधों की बढवार के समय और फूल आते समय सिंचाई अवश्य करें। मक्का की फ़सल में शुरू के 20-30 दिन तक खरपतवार निकालते रहें।
    
  मक्के के फ़सल में लगने वाले रोग  , किट पतंगों से सुरक्षा करने व दवा बनाने और उपचार करने का तरीका
 फड़का व सैन्य कीट
तुलासिता
दाने बनते समय खेत की परिधी से एक मीटर अन्दर तक लगे भुट्टों को पत्तियों से लपेट दे तथा प्रकाश परावर्तित करने वाले फीते का प्रयोग करें। केवल प्रकाश परावर्तित करने वाले फीते के प्रयोग करने से भी तोतों से नुकसान कम हो जाता है। फीते से फीते की दूरी 5 मीटर रखें। 
उपचार. नीम सबसे सहज उपलब्ध वृक्ष है । नीम के पत्तों का प्रयोग कर अत्यन्त प्रभावी कीटनाशक बनाया जा सकता है । नीम के पत्ते एक मिट्टी के घड़े में गोमुत्र में भिगोये जाते हैं । घड़े को जमीन में गाड़ कर कपड़े से उसका मुंह बन्द किया जाता है । २१ दिन इस प्रकार रखने से जो द्रव्य तैयार होता है वह कीटनाशक के रूप में प्रयोग किया जाता है । फसल पर छिड़कते समय इसे पानी में तरल कर उपयोग में लिया जाता है ।

२. नीम के बीज-निमोणी को पीसकर उसका प्रयोग खाद के रूप में किया जा सकता है । इसका खेत में पाँच वर्ष तक सतत प्रयोग करने के बाद फिर उस खेत में खाद की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है ।

४. केवल गोमुत्र को भी कीटनाशक के रूप में उपयोग में लिया जा सकता है । छिड़कने से पूर्व गोमुत्र को तरल किया जाता है । देसी गाय के १ लीटर गोमुत्र को ८ लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग किया जाता है । गोमुत्र के माध्यम से नैसर्गिक युरिया भी मिलने से कीटनाशक के साथ ही खाद के रूप में भी यह छिड़काव उपयोगी होता है ।

५. गोमुत्र के साथ नीम का तेल प्रयोग करने से भी कीट को भगाया जा सकता है । २ लीटर गोमुत्र में १४ लीटर पानी तथा ५० ग्राम नीम का तेल मिलाकर छिड़काव किया जाता है।

६. सिंचाई के समय पानी के साथ गोमुत्र प्रवाहित करने से खाद के रूप में उपयोग होता है ।

इन उपायों अलावा कुछ किसानों में लहसुन, मिर्च के द्वारा भी कीटनाशक के रूप में प्रयोग किया है । तम्बाकू के पानी का छिड़काव कीटनाशक के रूप में तथा बचे तम्बाकू के थोथे का प्रयोग खाद के रूप में किया जाता है । केवल गोमुत्र, गोबर से लगभग बिना लागत के जैविक कृषि के द्वारा उत्पादन में स्थायी वृद्धि कर लाभ की खेती की जा सकती है।

इन सब उपायों के साथ ही संकरित तथा रासायनिक प्रक्रिया से प्रसंस्कारित बीजों के स्थान पर स्वयं की उपज से रक्षित बीजों का प्रयोग अधिक लाभकारी होता है ।

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